भाजपाई मोदी जी या राहुल नेहरू ख़ान गांधी भारत की उम्मीद का सत्ता सामर्थ्य सब भविष्य की गर्त में

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“मोदी और राहुल, रहेगी झोली खाली”-.-.-.-.-.-• मोदी का प्रभामंडल कमज़ोर होता जाएगा, अगले चुनाव उनके नेतृत्व में नहीं• भाजपा सत्ता में बनी रहेगी पर नेतृत्व कमज़ोर होगा• प्रियंका मजबूत होंगी, सोनिया गांधी अप्रासंगिक हो जाएंगी• कांग्रेस कुछ और राज्यों में आगे बढ़ेगी पर केंद्र की सत्ता नहीं मिलेगी“अगला वर्ष संक्रमण काल”—-राजनीति का संसार बड़ा विचित्र है। यहाँ जो दिखाई देता है, वह हमेशा सत्य नहीं होता और जो सत्य होता है, वह अक्सर दिखाई नहीं देता। समय का चक्र जब एक विशेष मोड़ पर पहुँचता है, तब वह व्यक्तियों की नहीं, परिस्थितियों की परीक्षा लेता है। आने वाले वर्षों की भारतीय राजनीति को यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो एक रोचक चित्र उभरता है। यह चित्र न तो पूर्ण विजय का है और न पूर्ण पराजय का। यह उस संक्रमण काल का चित्र है जिसमें पुराने प्रतीक धीरे-धीरे अपना प्रभाव खोते हैं और नई शक्तियाँ जन्म लेने की तैयारी करती हैं।इस दृष्टि से देखने पर सबसे पहला संकेत यह मिलता है कि भारतीय राजनीति के दो सबसे बड़े चेहरे—नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी—दोनों की झोली अंततः खाली रहने वाली है। इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों राजनीतिक रूप से समाप्त हो जाएंगे। इसका अर्थ यह है कि दोनों अपने-अपने अंतिम लक्ष्य को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर पाएंगे। मोदी जी चाहेंगे कि उनकी राजनीतिक विरासत निर्विवाद रूप से स्थापित हो जाए, परंतु परिस्थितियाँ उन्हें वह संतोष नहीं देंगी जिसकी उन्होंने कल्पना की होगी। दूसरी ओर राहुल गांधी वर्षों से जिस राष्ट्रीय स्वीकृति और निर्णायक सत्ता की ओर बढ़ रहे हैं, वह भी उनके हाथ नहीं आएगी। दोनों नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष या सत्ता नहीं होगी, बल्कि समय होगा।समय का नियम है कि वह किसी व्यक्ति को स्थायी केंद्र नहीं बनने देता। एक दौर आता है जब जनता व्यक्ति से अधिक व्यवस्था की ओर देखने लगती है। आज भारत की राजनीति में जो व्यक्तित्व-केंद्रित वातावरण दिखाई देता है, वह धीरे-धीरे संस्थागत राजनीति की ओर मुड़ेगा। ऐसे में मोदी जी की लोकप्रियता धीरे-धीरे अवसान की ओर जाएगी। पार्टी में सब कुछ उनकी इच्छा के अनुसार नहीं होगा और सन् 2029 के चुनावों में वे भाजपा का चेहरा नहीं होंगे। इसी तरह राहुल गांधी की बढ़ती स्वीकार्यता भी उन्हें उस मुकाम तक नहीं पहुँचा पाएगी जिसकी अपेक्षा उनके समर्थक करते हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि दोनों की झोली अंततः अधूरी ही रहेगी।“भाजपा सत्ता में रहेगी, पर नेतृत्व कमज़ोर होगा”——भारतीय जनता पार्टी का संगठन आज भी देश का सबसे मजबूत राजनीतिक ढांचा माना जाता है। उसके पास कार्यकर्ताओं का विशाल नेटवर्क, संसाधन और वैचारिक आधार मौजूद है। इसलिए निकट भविष्य में भाजपा के अचानक कमजोर पड़ जाने की संभावना नहीं दिखती। पार्टी सत्ता में बनी रह सकती है और राष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख शक्ति भी बनी रह सकती है, किन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। भाजपा की शक्ति और उसके नेतृत्व की शक्ति अब एक समान नहीं रहेंगी। लंबे समय तक पार्टी का चेहरा कुछ सीमित नेताओं के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। भविष्य में यह केंद्रीकरण कमजोर होगा। नए चेहरे सामने आएंगे, लेकिन उनमें वैसा सर्वस्वीकार्य प्रभाव नहीं होगा जैसा पहले दिखाई देता था।नेतृत्व का यह संक्रमण भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो सकता है। संगठन मजबूत रहेगा, परंतु जनता को ऐसा कोई एक चेहरा नहीं मिलेगा जो पूरे देश में समान उत्साह पैदा कर सके। परिणामस्वरूप भाजपा चुनाव जीत सकती है, सरकार बना सकती है, पर उसकी राजनीतिक चमक पहले जैसी नहीं रहेगी और उसे गठबंधन के लिए विवश होना पड़ेगा।यह भी संभव है कि पार्टी के भीतर विभिन्न क्षेत्रीय नेताओं का महत्व बढ़े। राष्ट्रीय नेतृत्व अपेक्षाकृत कमजोर और क्षेत्रीय नेतृत्व अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई दे। इससे पार्टी में आंतरिक संतुलन की नई स्थिति बनेगी। भाजपा का अस्तित्व और प्रभाव बना रहेगा, पर उसका नेतृत्व पहले जैसा निर्णायक नहीं रहेगा।“प्रियंका गांधी का उभार”——राजनीतिक घटनाओं के भीतर कभी-कभी ऐसे संकेत छिपे होते हैं जिन्हें तत्काल नहीं पहचाना जाता। प्रियंका गांधी का भविष्य भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। लंबे समय तक उन्हें केवल एक सहायक भूमिका में देखा गया, लेकिन आने वाले समय में उनका राजनीतिक महत्व बढ़ेगा। इसका कारण केवल उनका पारिवारिक नाम नहीं होगा, बल्कि उनकी संवाद क्षमता और जनसंपर्क शैली होगी।भारतीय राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव का महत्व बहुत बड़ा होता है। जनता केवल नीतियाँ नहीं देखती, वह व्यक्तित्व का प्रभाव भी महसूस करती है। प्रियंका गांधी में यह गुण अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है। वे भीड़ से संवाद स्थापित करने और स्वयं को सहज रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता रखती हैं। यही कारण है कि कांग्रेस के भीतर और बाहर दोनों स्थानों पर उनका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ सकता है।यह उभार अचानक नहीं होगा। यह क्रमिक प्रक्रिया होगी। पहले उन्हें संगठन में अधिक महत्व मिलेगा, फिर चुनावी रणनीति में उनकी भूमिका बढ़ेगी और अंततः वे कांग्रेस की प्रमुख शक्ति के रूप में उभर सकती हैं। यह भी संभव है कि आने वाले वर्षों में कांग्रेस के भीतर निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति उनके आसपास केंद्रित होने लगे।“सोनिया गांधी की प्रासंगिकता में कमी”—-राजनीति में सबसे कठिन कार्य है समय पर पीछे हटना। जो व्यक्ति लंबे समय तक केंद्र में रहता है, उसके लिए यह स्वीकार करना कठिन हो जाता है कि अब परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। सोनिया गांधी भारतीय राजनीति की अत्यंत प्रभावशाली नेता रही हैं। उन्होंने कांग्रेस को कई संकटों से निकाला और एक समय ऐसा भी था जब पार्टी का पूरा ढांचा उनके नेतृत्व पर टिका हुआ था।किन्तु समय का चक्र अब नई दिशा में घूम रहा है। कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी का प्रभाव बढ़ेगा और पुराने नेतृत्व की भूमिका स्वाभाविक रूप से सीमित होती जाएगी। इसका अर्थ यह नहीं कि सोनिया गांधी का सम्मान कम होगा। सम्मान और प्रासंगिकता दो अलग बातें हैं। सम्मान बना रहेगा, परंतु राजनीतिक निर्णयों में उनकी भूमिका नगण्य रहेगी।जब किसी संगठन में नई पीढ़ी अपना स्थान बनाती है, तब पुरानी पीढ़ी धीरे-धीरे पीछे हटती चली जाती है। यही स्थिति सोनिया गांधी के साथ दिखाई देती है। आने वाले समय में कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता उनका ज़िक्र तो करेंगे, लेकिन पार्टी की दिशा तय करने वाले निर्णय उनके हाथों में नहीं रहेंगे। इस प्रकार वे धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होती जाएंगी।“कांग्रेस का विस्तार, लेकिन सत्ता नहीं”——कांग्रेस के लिए आने वाला समय पूरी तरह निराशाजनक नहीं दिखाई देता। पार्टी कई राज्यों में अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है। कुछ नए राज्यों में उसे सफलता मिल सकती है और कुछ पुराने क्षेत्रों में वह पुनर्जीवित भी हो सकती है। इसका मुख्य कारण भाजपा-विरोधी मतों का एकत्र होना और स्थानीय नेतृत्व का उभार होगा।किन्तु राज्य और केंद्र की राजनीति में बहुत अंतर होता है। किसी राज्य में सरकार बनाना और पूरे देश में बहुमत प्राप्त करना दो अलग-अलग बातें हैं। कांग्रेस क्षेत्रीय स्तर पर प्रगति करेगी, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसे वह व्यापक समर्थन नहीं मिलेगा जो केंद्र की सत्ता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।भारत की राजनीति अब बहुध्रुवीय है ही। क्षेत्रीय दल बने रहेंगे, पर वे गठबंधन में रहकर ही जीवित रहेंगे। कांग्रेस को सहयोगियों की आवश्यकता होगी, और सहयोगियों के साथ चलने की अपनी सीमाएँ होती हैं। परिणामस्वरूप कांग्रेस कई राज्यों में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएगी, लेकिन केंद्र में पूर्ण सत्ता तक नहीं पहुँच पाएगी।“निष्कर्ष : संक्रमण का युग”——समग्र रूप से देखें तो आने वाला समय किसी एक दल या एक नेता की पूर्ण विजय का नहीं है। यह संतुलन, समझौते और परिवर्तन का युग होगा। नरेंद्र मोदी अपनी विरासत को पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर पाएंगे, राहुल गांधी अपने अंतिम राजनीतिक लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएंगे, प्रियंका गांधी का प्रभाव बढ़ेगा, सोनिया गांधी पृष्ठभूमि में चली जाएंगी, भाजपा सत्ता में रहते हुए भी नेतृत्व संकट का सामना करेगी और कांग्रेस विस्तार के बावजूद केंद्र की कुर्सी से दूर रहेगी।राजनीति का यह नया अध्याय हमें यह भी सिखाता है कि इतिहास कभी स्थिर नहीं रहता। जो आज शिखर पर है, वह कल चुनौती में हो सकता है और जो आज संघर्ष में है, वह कल अवसर प्राप्त कर सकता है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, नारे बदलते हैं, पर समय का नियम नहीं बदलता। समय हमेशा व्यक्ति से बड़ा रहता है।इसीलिए भविष्य का सबसे बड़ा संदेश यह है कि आने वाले वर्षों में भारत की राजनीति व्यक्तियों की नहीं, बल्कि बदलते संतुलनों की राजनीति होगी। कोई पूर्ण विजेता नहीं होगा, कोई पूर्ण पराजित नहीं होगा। सब कुछ मिलेगा भी और अधूरा भी रह जाएगा। यही इस भविष्यवाणी का सार है। *साभार।।।।।।।

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