सनातन रचेयता भगवान श्रीराम जन्म की संपूर्ण कथा श्री

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चंडीगढ़ सोमवार 22 जून 2026 आर के विक्रमा शर्मा अनिल शारदा रक्षत शर्मा—- सतयुग के बाद त्रेतायुग में अयोध्या नगरी में राजा दशरथ राज्य करते थे। वे अत्यंत धर्मात्मा, प्रजावत्सल और पराक्रमी राजा थे। उनकी तीन रानियाँ थीं—कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। राज्य में सुख, शांति और समृद्धि थी, किंतु राजा दशरथ के जीवन में एक बड़ी कमी थी—उनकी कोई संतान नहीं थी।संतान न होने के कारण राजा दशरथ अत्यंत चिंतित रहते थे। उन्हें चिंता थी कि उनके बाद राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा। एक दिन उन्होंने अपने कुलगुरु वशिष्ठ से अपनी व्यथा कही। गुरु वशिष्ठ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी और बताया कि इस यज्ञ को महान तपस्वी ऋष्यशृंग के द्वारा संपन्न कराया जाए।राजा दशरथ ने बड़े आदरपूर्वक ऋष्यशृंग को अयोध्या आमंत्रित किया। शुभ मुहूर्त में भव्य पुत्रकामेष्टि यज्ञ आरंभ हुआ। अनेक ऋषि-मुनि, देवताओं के उपासक और विद्वान ब्राह्मण उसमें सम्मिलित हुए। यज्ञ कई दिनों तक चला। जब यज्ञ पूर्णाहुति के निकट पहुँचा, तब यज्ञकुंड से स्वयं अग्निदेव प्रकट हुए। उनके हाथ में स्वर्ण पात्र में भरी हुई दिव्य खीर थी।अग्निदेव ने राजा दशरथ से कहा, “राजन्! देवताओं की कृपा से यह दिव्य पायस (खीर) आपको प्रदान किया जाता है। इसे अपनी रानियों को खिलाइए, इससे आपको तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ति होगी।”राजा दशरथ अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उस दिव्य खीर का आधा भाग महारानी कौशल्या को दिया। शेष आधे भाग का आधा कैकेयी को दिया। फिर बचे हुए भाग को दो हिस्सों में बाँटकर दोनों भाग सुमित्रा को प्रदान किए।समय बीतने पर तीनों रानियाँ गर्भवती हुईं। देवताओं ने भी इस अवसर पर आनंद मनाया, क्योंकि भगवान विष्णु ने रावण के अत्याचारों से पृथ्वी को मुक्त करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार लेने का संकल्प किया था।चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि, मध्याह्न काल, पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में भगवान श्रीराम का जन्म माता कौशल्या के गर्भ से हुआ। उनके जन्म के समय समस्त अयोध्या आनंद और उत्साह से भर उठी। देवताओं ने पुष्पवर्षा की, गंधर्वों ने गीत गाए और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।इसके बाद महारानी कैकेयी ने भरत को जन्म दिया। महारानी सुमित्रा के गर्भ से दो पुत्र उत्पन्न हुए—लक्ष्मण और शत्रुघ्न।चारों राजकुमारों के जन्म से अयोध्या में उत्सव मनाया गया। राजा दशरथ ने दान-दक्षिणा दी, ब्राह्मणों को वस्त्र और गौदान किया तथा पूरी नगरी को सजाया गया। बालक राम बचपन से ही असाधारण गुणों से युक्त थे। वे विनम्र, सत्यवादी, करुणामय और धर्म के प्रति समर्पित थे। आगे चलकर उन्होंने महर्षि विश्वामित्र के साथ राक्षसों का विनाश किया, माता सीता से विवाह किया और अंततः रावण का वध कर धर्म की स्थापना की।इस प्रकार पुत्रकामेष्टि यज्ञ के फलस्वरूप भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेकर पृथ्वी का भार हल्का किया और मर्यादा, सत्य, त्याग तथा धर्म का आदर्श स्थापित किया।जय श्रीराम! 🚩🙏#कृष्णा

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