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चंडीगढ सोमवार 29/06/2026 एमआर के विक्रमा शर्मा +रक्षत शर्मा प्रस्तुति —- भारतीय सैन्य रणबांकुरों को कृतज्ञ राष्ट्र का शत शत नमन है. “सर, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूंगा… मेरी मुख्य तोप अभी भी काम कर रही है!”
ये शब्द थे सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के—एक ऐसे 21 वर्षीय भारतीय अधिकारी के, जिसने 1971 के भारत-पाक युद्ध में अद्भुत साहस का इतिहास लिख दिया।
शकरगढ़ सेक्टर में पाकिस्तान की 13 लांसर्स के आधुनिक पैटन टैंकों ने भारतीय मोर्चे पर भीषण हमला बोला। भारतीय सेना की 17 पूना हॉर्स ने मोर्चा संभाला। इसी लड़ाई में अरुण खेत्रपाल अपने सेंचुरियन टैंक के साथ रणभूमि में उतरे।
भीषण युद्ध के दौरान उनका टैंक दुश्मन के गोले से धधक उठा। वरिष्ठ अधिकारियों ने रेडियो पर आदेश दिया—”टैंक छोड़ दो।”
लेकिन जवाब आया—
«”No Sir, I will not abandon my tank. My main gun is still working.”
“नहीं सर, मैं अपना टैंक नहीं छोड़ूंगा। मेरी मुख्य तोप अभी भी काम कर रही है।”»
यह उनका अंतिम रेडियो संदेश था।
जलते हुए टैंक में बैठे-बैठे उन्होंने दुश्मन के चार और टैंक ध्वस्त कर दिए। अंत में सामने केवल एक पाकिस्तानी टैंक बचा। दोनों ने लगभग 200 मीटर की दूरी से एक-दूसरे पर एक साथ गोला दागा। दुश्मन का टैंक क्षतिग्रस्त हुआ, उसका कमांडर बाहर निकल आया, लेकिन अरुण खेत्रपाल अपने जलते टैंक में ही वीरगति को प्राप्त हुए।
उन्हें उस समय केवल 21 वर्ष की आयु थी।
वर्षों बाद, 2001 में, अरुण खेत्रपाल के पिता ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल की मुलाकात पाकिस्तान के उसी अधिकारी ब्रिगेडियर नासेर से हुई, जो अंतिम मुकाबले में उनके सामने था।
नासेर ने सिर झुकाकर कहा—
“आपका बेटा असाधारण वीर था। वह अकेला ही हमारी हार का सबसे बड़ा कारण बना।”
जब यह कहानी समाप्त हुई, तो कुछ क्षण दोनों ओर सन्नाटा रहा। फिर एक पिता ने अपने बेटे के प्रतिद्वंद्वी सैनिक को गले लगा लिया। उस पल युद्ध हार-जीत से ऊपर उठ चुका था—वह केवल सैनिकों के साहस और सम्मान का क्षण था।
ऐसे अमर वीरों के कारण ही भारत का तिरंगा सदैव गर्व से लहराता है।
शत्-शत् नमन, परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल। 🇮🇳🌺


