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चंडीगढ़ बृहस्पतिवार 12 मार्च 2026 आरके विक्रमा शर्मा अनिल शारदा रक्षत शर्मा—- महंगाई तो भाइया तब भी थी, जब महंगाई थी ही नहीं। महंगाई तो देश की गुलामी के वक्त भी थी और देश की आजादी में है।। भौतिक चराचर जगत में महत्वपूर्ण भूमिका महंगाई निभाती आई है। देशभक्त तो क्या देश द्रोही राजनीतिक दलों को भी महंगाई ने ही सत्ता सिंहासन पर विराजमान किया और भविष्य में भी अविरल प्रवाहमय करती रहेगी। महंगाई और सियासत का अटूट बंधन होता है तभी तो बेबस तरसती तड़पती जनता जाए भाड़ में। लेकिन लगता है यह बातें गुजरी जमाने की हैं। अब एक बारगी देखा जाए तो महंगाई अपनी आदतन गति से आगे बढ़ रही है। भले ही गरीब असहाय परिवार विकास और आत्मनिर्भरता से कोसों पिछड़ते हुए दो वक्त की रोटी खाने की चाहत से भी बिछुडते जा रहे हैं। पर अब दुनिया के गरीबी से दो चार होने वाले मुल्कों ने गरीबी से ही छुटकारा पाने की राह खोज ली है। हालांकि इससे पहले भी गरीबी से बाहर निकल जाने की जुगाड़े खूब फलीभूत होती रही हैं। जिस पर जाति के बाद से अभी तक सबसे ज्यादा समय शासन करने वाली एक पार्टी ने गरीबी हटाने के लिए गरीबों को ही मिटा देने का फार्मूला खोज निकाला था। गरीबी से 2–4 होने वालों को ही यातनाएं देकर जेलों में ठूंस कर और जिंदगी से ही मिटाकर गरीबों की जनसंख्या वृद्धि दर पर अंकुश भी लगाये थे।।। लंबे हेयर से तक सट्टा सीन रहने वाली सियासी पार्टी ने एक और फार्मूला पेश किया था जो अब फिर लाइम लाइट में आकर सूर्खियां बटोर रहा है।। ध्यान दें यह फार्मूला सच में कालजयी है।

