ताज पर पाकिस्तानी आतंकियों दोगले हिंदूओं और खांग्रेस ने किया था नरसंहार हमला???

Loading

चंडीगढ़ मुंबई शुक्रवार 22/05/2026 आरके विक्रमा शर्मा अनिल शारदा अरुण कौशिक प्रस्तुति—मुंबई में में हुए 26/11 आ’तंकी हमले को शायद ही कभी देश भूल पाएगा। आज इस आ’तंकी हमले के 17 साल पूरे हो गए हैं। साल 2008 में पाकिस्तान से आए 10 आ’तंकियों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में इतना हाहाकार मचाया था कि पूरा देश उससे दहल उठा था। हर आ’तंकी के पास एके-47 थी।

तमाम सुरक्षाबल सिर्फ इसी कोशिश में जुटे थे कि किसी तरह आतंकियों को दबोचा जाए। हालाँकि अंत में जो जिंदा पकड़ा गया वो सिर्फ अजमल कसाब था और जिसने उसे पकड़वाया वो बहादुर सिपाही तुकाराम ओंबले थे। क्युकी हमले के बाद 10 आ’तंकियों में से किसी एक का ज़िंदा पकड़ा जाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी था।

27 नवंबर को डीबी मार्ग पुलिस को करीब 10 बजे सूचना मिली कि 2 हथियारबंद आ’तंकी गाड़ी में बैठकर आतंक मचा रहे हैं। इसके बाद 15 पुलिसकर्मियों को डीबी मार्ग से चौपाटी की ओर मरीन ड्राइव पर बैरिकेडिंग के लिए भेजा गया। जब आ’तंकियों की गाड़ी उस रास्ते आई तो वो 40-50 फीट पहले रुकी।

चारों ओर पुलिस को देख आ’तंकी घबरा गए और पुलिस पर फायरिंग शुरू हुई। पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की और एक आ’तंकी को मार गिराया। वहीं कसाब ने मरने की एक्टिंग करनी शुरू कर दी। सभी को लगा कि दोनों आ’तंकी ढेर हो गए हैं लेकिन फिर भी पुष्टि के लिए किसी को आगे बढ़ना था।

पुलिसकर्मियों की भीड़ से तुकाराम आगे बढ़े और गाड़ी के पास हाथ बढ़ाया। इतनी ही देर में कसाब ने अपनी एके-47 उठाई और ओंबले पर दागने चला। ओंबले ने फौरन कसाब की बंदूक की बैरल पकड़ी, मगर फिर भी उसने ट्रिगर दबा दिया। अब गोलियाँ ओंबले के पेट और आंत के आर-पार थीं। लेकिन 40 गोलियाँ खाने के बावजूद इसके उन्होंने कसाब की गर्दन दबोची तो उसे मरते दम तक नहीं छोड़ा।

ओंबले की बहादुरी कहिए या कुछ और…जिस समय परमबीर सिंह जैसे तमाम बड़े पद के पुलिस अधिकारी आ’तंकियों का सामना करने के नाम पर पीछे हट गए थे, उस समय पर ओंबले अपनी लाठी लेकर आगे बढ़े और जब गोली लग गई तब भी उन्होंने उस आ’तंकी को नहीं छोड़ा। इस बहादुरी का नतीजा क्या हुआ ये बाद में पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया की किताब ‘Let me say it now’ से खुला।

राकेश मारिया की किताब बताती है कि जब ओंबले पर गोली चली तो साथी पुलिस वाले आवेश में आकर जवाबी कार्रवाई करने जा रहे थे। लेकिन डीबी मार्ग पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर संजीव गोविलकर ने उन्हें कहा कि उसे मत मारो वही तो सबूत है।

26/11 हमला करके पाकिस्तानी आ’तंकियों का एक मकसद हिंदुओं को बदनाम करना था। अगर उस रात कसाब न जिंदा बचता या भाग जाता तो शायद हम ये बात नहीं जान पाते है कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और आ’तंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा चाहते थे कि अजमल बतौर समीर चौधरी मरे। ताकि दुनिया हिंदुओं पर ऊँगली उठाए और इस पूरे हमले को भगवा आ’तंक करार दिया जा सके। इस साजिश को अंजाम देने के लिए आ’तंकियों के हाथ में कलावे बांधे गए थे। साथ ही उन्हें भारतीय पते और हिंदू नाम वाले पहचान पत्र मुहैया करवाए गए थे। 💐🇮🇳💐🇮🇳

indian army jindabad.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

734587

+

Visitors