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पितृ ही नहीं बल्कि मातृ भक्त शिरोमणि भी थे भगवान श्री परशुराम जी ; पं० रामकृष्ण शर्मा
पंचकूला /चंडीगढ़ ; 18 जून ; आरके विक्रमा /एनके धीमान ;—- आज देश प्रदेश में फादर्स डे {[पितृ दिवस] यहाँ पितृ अर्थात पिता नाकि पितृलोक के } धूमधाम से मनाया गया ! ये 365 डिओन में इक ही दिन उस परमपिता स्वरूप पिता के लिए जिसके हम अंश हैं ! खैर आधुनिकता की अंधी दौड़ में आज की युवा और वेस्टर्न कल्चर्ड में धंसती जनरेशन को अपने पिता के लिए भले ही इक दिन मिला पर तारीफ तो बनती है कि संस्कार चाहे देशी हों या विदेशी उनकी थाती ये युवा जमात है ! लेकिन सही मायने क्या हैं और वास्तवकिता किस करवट बैठती है ये विचार धर्मवत ज्ञान साँझा करते हुए धर्म पिपासु धर्मज्ञ और सनातनी पराकाष्ठा की महिमा के बखानी पंडित रामकृष्ण शर्मा जिनको धर्म गुरुओं श्री 108 ब्रह्मलीन गुरु गौरवा नंद जी मुनि जी और गीताधाम के संस्थापक और श्री गीता जयंती की श्रीगणेश करवाने वाले ब्रह्मलीन गुरदेव 1008 श्री गीतानंद जी महराज आदि ने कलियुग का श्रवणकुमार की संज्ञा से अलंकृत किया है, ने पितृ भक्त और मातृ भक्त के बारे में प्रसंगिकता भरी जानकारी देते हुए बताया कि भगवान परशुराम को सिर्फ पितृभक्त कह कर ही सम्बोधित किया जाता है ! क्योंकि पिता जगदग्नि के एक बार कहने पर ही भगवान परशुराम ने अपने फरसे से अपनी माता रेणुका जी का वध कर दिया था ! पिता के पूछने पर बोले कि पिता की आज्ञा सर्व प्रथम और सर्वोपरि है ! पिता ऋषिवर ने प्रसन्न होकर पितृ भक्त पुत्र को वरदान मांगने को कहा ! तो क्षण मात्र का भी विलम्ब किये बिना परशुराम ने अपने पिता से अपनी माता रेणुका जी को पुन: जीवित करने की विनय की ! अति कुशाग्र बुद्धि के धनी पराक्रमी बलपुंज परशुराम से प्रसन्न पिता ने मातृ भक्त परशुराम की विनय स्वीकारी और रेणुका जिको जीवित किया ! भगवान परशुराम जी को मातृहत्या का महापाप लगा था ! पर पुनः जीवित हुई माता और पिता के श्रीआशीर्वाद से और पश्चाताप से परशुराम जी ने पाप से मुक्ति पाई थी ! ये वो ही वीर पराक्रमी योद्धा था जिसने पाप अधर्म करने वाले क्षत्रिय वंश का महाविनाश करने हेतु 26 बार से ज्यादा फरसा धारण किया था और वध करके क्षतिर्य से धरती को विहीन करने का पराक्रम दिखाया था ! पंडित रामकृष्ण शर्मा जी के मुताबिक भगवान परशुराम भगवान विष्णु जी के छठे अंशावतार थे ! और महाशिव बाबा के परम् भक्त थे ! भगवान परशुराम आजकल सोशल मीडिया पर हर कोई ब्रह्मज्ञानी बना उपदेश दे रहा ! पर बिना तर्क तथ्य और वास्तविकता जाने गलत व्याख्या धर्म परिभाषा और देवीदेवताओं को अपने मनमर्जी अनुसार महिमा मंडित और महिमा खंडित करने में व्यस्त है ! तो ये आज का दिवस पिता की महान पराकाष्ठा अतिवर्णीय भूमिका अनिवार्य जीवन सम्मत उपस्थिति के प्रति नतमस्तक हों और पिता के सदैव स्वस्थ दीर्घायु होने की मंगल कामना करें ! पिता की ख़ुशी भौतिक सुखों में न होकर संतान की समृद्धि सम्पन्नता में है ! सो पिता के लिए संतान के बनते बुनियादी कर्तव्य और जवाबदेही के प्रति अपनी जिम्मेवारी निभाएं वो भी निर्लेप आस्था भाव सहित निस्वार्थी कर्म के साथ तो पिता का हृदय संताप के प्रति सजगता से चिंतातुर रहेगा ! मातापिता परम् सौभग्य व् पिछले सहस्त्रों जन्मों के धर्मपुन्यों से प्राप्त होते हैं ! सो उनकी सेवा उनकी आज्ञा पालना और उनके प्रति दिल में अच्छी पुष्ट भावना रखना हितकर खुद के लिए होता है !



