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चंडीगढ़ बृहस्पतिवार 3.09.2026 अल्फा न्यूज इंडिया प्रस्तुति—-ये …ये हैं मुरैना के गिरवर सिंह तोमर इनकी कहानी संघर्ष और हौसले की मिसाल है. 1991 में सी आर पी एफ में हवलदार बने गिरवर सिंह को वरिष्ठ अधिकारी से विवाद के बाद 1999 में बर्खास्त कर दिया गया था. जिसके बाद वो संत बन गए थे।
आपको बता दे 1999 में नौकरी से बर्खास्त हुए गिरवर सिंह तोमर मुरैना के छिछावली गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने 1991 में CRPF में हवलदार के पद पर सेवा शुरू की थी। करीब आठ साल की सेवा के बाद एक वरिष्ठ अधिकारी से उनका विवाद हुआ। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई। 1999 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
नौकरी गई तो मंदिर में शुरू की साधना बर्खास्तगी के बाद गिरवर सिंह मुरैना लौट आए। उन्होंने मंदिर में रहकर पूजा-पाठ और साधना शुरू कर दी। बाद में वे गुफा मंदिर पहुंचे। यहां वे ‘गिरवर दास महाराज’ के नाम से संत के रूप में पहचाने जाने लगे। मंदिर में रहने के बावजूद उन्होंने नौकरी वापस पाने की कोशिश नहीं छोड़ी। और 26 साल लंबी कानूनी जंग के बाद अब उनकी दोबारा सीआरपीएफ में वापसी हुई है।
50 वर्षीय गिरवर सिंह को हाल ही में छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नियुक्ति मिली है। लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर उन्होंने सीआरपीएफ की वर्दी पहन ली है। अब वह अपनी सेवा में प्रमोशन के लिए भी कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।
1991 में बने थे हवलदार
गिरवर सिंह तोमर का चयन वर्ष 1991 में सीआरपीएफ में हवलदार के पद पर हुआ था। करीब आठ वर्ष तक सेवा करने के बाद उनका नाम प्रमोशन सूची में आने वाला था। इसी दौरान वर्ष 1999 में एक वरिष्ठ अधिकारी से उनका विवाद हो गया। विवाद बढ़ने पर पहले उन्हें निलंबित किया गया और फिर विभागीय जांच के बाद 21 अक्टूबर 1999 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

नौकरी गई तो मंदिर में बिताने लगे जिंदगी
बर्खास्तगी के बाद कुछ समय तक गिरवर घर पर रहे, लेकिन उनका मन नहीं लगा। इसके बाद उन्होंने आध्यात्मिक राह पकड़ ली। स्वजन के मुताबिक, शुरुआती चार-पांच वर्ष उन्होंने बारहद्वारी मंदिर में रहकर पूजा-पाठ किया। इसके बाद मुरैना के गुफा मंदिर में संत के रूप में रहने लगे।
2007 में कोर्ट से मिली पहली जीत
बर्खास्तगी के खिलाफ गिरवर दास ने वर्ष 1999 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। करीब आठ साल की कानूनी लड़ाई के बाद 2007 में हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, इसके बाद सीआरपीएफ ने स्टे ले लिया और उनकी वापसी का रास्ता फिर रुक गया।
गिरवर ने हार नहीं मानी और मामले को हाई कोर्ट की डबल बेंच के सामने रखा। लंबी सुनवाई के बाद 28 अगस्त 2025 को डबल बेंच ने सीआरपीएफ को तीन महीने के भीतर उन्हें ज्वाइनिंग देने का आदेश दिया।
छह महीने इंतजार के बाद आखिरकार मिली वर्दी
कोर्ट के आदेश के बावजूद करीब छह महीने तक ज्वाइनिंग नहीं मिलने पर गिरवर ने फिर प्रयास शुरू किए। उन्होंने वकीलों के माध्यम से संबंधित अधिकारियों को नोटिस भिजवाए और कोर्ट के आदेश के पालन की मांग की।
आखिरकार 26 अगस्त को सीआरपीएफ ने उन्हें छत्तीसगढ़ के बीजापुर में पोस्टिंग दे दी। करीब 26 साल बाद गिरवर सिंह की सरकारी सेवा में वापसी हुई और उन्होंने फिर सीआरपीएफ की वर्दी पहन ली।💐💐🇮🇳🇮🇳

