सनातन की सकारात्मक समृद्ध सोच का प्रभाव सब इंसानियत पर

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चंडीगढ़ 25/1/26 आरके विक्रमा शर्मा अनिल शारदा हरीश शर्मा अश्वनी शर्मा प्रस्तुति —–*उस शाम शहर के सबसे बड़े गुरुद्वारे में एक बहुत बड़े लंगर का आयोजन समाप्त हुआ । हवा में देसी घी के हलवे की खुशबू अभी भी तैर रही थी । दिन भर लाउडस्पीकर से मानस की जात सबै एकै पहचानबो (समस्त मानव जाति को एक ही पहचानो) के पवित्र शबद जमकर गूंजे थे ।

रात हुई । दिन भर के थके सेवादार सोने चले गए । आधी रात में लंगर के भंडार से कुछ खटर–पटर की आवाजें आई । सेवादार जाग गए । भागकर भंडार की ओर गए । वहां देखा तो एक उन्नीस–बीस साल का पागल सा लड़का , जिसके पीठ पर लदे हुए थैले में पता नहीं क्या–क्या कबाड़ भरा हुआ है , एक कौने में दुबका बैठा था ।

उसके गंदे से हाथों में एक सूखी रोटी थी । वह कुछ मंदबुद्धि था । उसे यह समझ नहीं थी कि रोटी पाने के लिए लंगर में आकर पहली पंक्ति में बैठना पड़ता है । सिर को रुमाल से बांधकर ढंकना पड़ता है और फिर हाथ फैलाकर रोटी को लपकते हुए यह दिखाना पड़ता है कि वह भूखा है । उस पागल को दिन–रात का क्या पता ? उसे तो बस भूख का पता था जो पेट की दीवारों को किसी भूखे भेड़िए की तरह लगातार काट रही थी । रोटी की तलाश उसे गुरु घर में लंगर के भंडार तक खींच लाई । उसकी क्या गलती ? भूख की गलती थी । इसी गलती के चलते उसने सुनसान पड़े भंडार में से एक रोटी उठा ली थी ।

​बस उसका ये करना था कि चोर–चोर के शोर से पवित्र परिसर गूंज उठा । सेवादारों के हाथ जो कुछ देर पहले श्रद्धालुओं के पैर धो रहे थे अचानक मुट्ठियां बन गए । उसे घेर लिया गया । वह घबराया हुआ था पर थोड़ा मुस्कुरा रहा था । वह मासूम ऐसी मुस्कान बिखेर रहा था जो केवल उन लोगों के पास होती है जिनका दिमाग दुनियादारी की चालाकियों से मुक्त होता है । उसे लगा शायद यह कोई खेल है ​लेकिन वह खेल नहीं था । उसे पता ही नहीं था कि एक रोटी के चक्कर में वह मौत के मुंह में आकर खड़ा हो गया है ।

पहला थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा तो रोटी का टुकड़ा उसके हाथ से छिटक कर बाहर नाली के पास जा गिरा । फिर लात-घूंसों की बौछार शुरू हुई । लाठी–डंडों से पीटा गया । उसकी हर चोट के साथ लोग धर्म रक्षा का पुण्य कमा रहे थे । वे एक ऐसे पापी को दंड दे रहे थे जिसने गुरु के घर से लेकर एक रोटी खा ली थी ।

हैरानी की बात थी कि जिस भीड़ ने उसे मारा वही भीड़ कुछ देर पहले अरदास में जोर–शोर से चिल्ला रही थी— देग तेग फतेह मतलब देग , दान और शक्ति की विजय हो । देग और दान तो वहां थे पर शायद उस रोटी के एक टुकड़े से बड़े नहीं थे ।

​जब तक उसकी सांसें उखड़ नहीं गईं तब तक उस पर प्रहार जारी रहे । अंत में वह पानी–पानी कराहता हुआ शांत हो गया । उसकी फटी हुई कमीज के नीचे पसलियों को देखकर साफ पता चल रहा था कि शायद कई दिनों भूखा था । ​अगले दिन अखबारों में छोटी सी खबर छपी— गुरुद्वारे में बेअदबी करते पकड़ा गया अज्ञात व्यक्ति भीड़ के हत्थे चढ़ा । मौत ।

पूरे प्रदेश के नामचीन जत्थेदारों ने , संगत वालों , बंदे–बंदियों ने उसी शाम गुरुद्वारों में जाकर रब का शुक्रिया अदा किया कि उनका वखरा धर्म सुरक्षित है । बेअदबी करने वाले को उसकी सजा मिल चुकी है । लंगर फिर से सजा । वही घी की खुशबू वही भोजन । वही दाल , वही हलवा । बस बाहर कोने में वह रोटी का टुकड़ा अब भी पड़ा था जिसे अब एक कुत्ता सूंघ कर आगे बढ़ गया । शायद कुत्ता उस मंदबुद्धि से ज्यादा समझदार था……………

उसे पता था कि लंगर की यह रोटी अब किसी के खून से सनी है………!!
फिर कुछ दिन बाद आए इन्ही पंगतदारों के असली जीजा जिन्होंने 1947 में आधे पंजाब की सिख लड़कियों को पाकिस्तान में रोक लिया उन्होंने गुरुद्वारा साहिब के तालाब में कुल्ला किया और इसारो में समझा दिया अब जीजा जी का प्रसाद ग्रहण करो और औक़ात हो तो अब बेअदबी चिल्लाकर दिखाओ ।

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