अंग्रेजों के जमाने के जोकर “असरानी जी नाउ नो मोर”

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उन्होंने दिवाली के दिन मुंबई के एक अस्पताल में आखिरी सांस ली। असरानी लंबे समय से फेफड़ों की समस्या से जूझ रहे थे। पाँच दशक से ज़्यादा के करियर में उन्होंने 350 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया और ‘शोले’ में अंग्रेज़ों के ज़माने वाले जेलर के किरदार से अमर हो गए।

जो असरानी कभी कालीन बेचते थे, आज वे कला के डॉक्टर कहे जाते हैं! भारतीय फिल्म जगत के दिग्गज कलाकार गोवर्धन ‘असरानी’ का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं!

बंटवारे के बाद एक सिंधी परिवार जयपुर आया। उसी परिवार में जन्मे असरानी ने बचपन सादगी में गुज़ारा।

पिता कालीन बेचते थे, और असरानी… सपने।
दिन में पढ़ाई, रात में ऑल इंडिया रेडियो में वॉइस आर्टिस्ट की नौकरी – ताकि पढ़ाई जारी रह सके। लेकिन दिल तो हमेशा एक्टिंग में ही अटका था।

ऋषिकेश मुखर्जी जैसे दिग्गजों से मार्गदर्शन मिला, FTII में ट्रेनिंग ली, गुजराती फिल्मों से शुरुआत की और फिर हिंदी सिनेमा के सबसे चहेते कॉमेडियन बन गए।

‘शोले’ के जेलर से लेकर 300 से ज़्यादा फिल्मों तक – असरानी जी ने हर किरदार में जान डाल दी।
हमें हंसाया, रुलाया और भरपूर मनोरंजन किया।

आज उन्हीं के हुनर और जुनून को सम्मान मिला है – Invertis University ने असरानी जी को ‘Doctor of Arts’ की उपाधि दी है।

एक ऐसे कलाकार को सलाम जिसने कभी रुकना नहीं सीखा – और हमें यादगार किरदार दिए, जो हमेशा दिल में रहेंगे।

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