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चंडीगढ़ 8 अगस्त आरके विक्रमा शर्मा/ करण शर्मा/ हरीश शर्मा प्रस्तुति:——
चल सदगुरु की हाट,ज्ञान बुद्धि लाइये ।
कीजे सदगुरु से हेत, परम पद पाइए।।
दाता दयाल का एक बड़ा प्यारा शब्द है। सदगुरु के पास किस लिए जाना है — ज्ञान मांगने या नौकरियां मांगने नहीं,संसार को मांगने के लिए नहीं।सदगुरु के पास जाना है ज्ञान बुद्धि मांगने।सुबुद्धि को,सालिक बुद्धि को पाने जाना है। उस विवेक को तुम लेने जाते हो,समझ को लेने जाते हो।
जो ज्ञान बुद्धि हैं वह तुम्हें परम पद तक ले जाती है और जो कुबुद्घि है वह तुमसे बुरे कर्म करवाती है,वह तुम्हें बुराई की ओर ले जाती है।जिसकी बुद्धि नहीं उसके जीवन में क्या है?उसके जीवन में शांति नहीं होती,उसके जीवन में सुख भी नहीं होता
जिसमें बुद्धि नहीं है,भावना नहीं है उसमें कुछ भी नहीं होगा।उसमें प्रेम नहीं होगा,उसके भीतर परमात्मा नहीं होगा,वह अयुक्त होगा।बुद्धि किसकी खो जाती है।जिसने परमात्मा की ओर पीठ की हुई है। जो परमात्मा से विमुख है,परमात्मा के उन्मुख नहीं है।जो गुरमुख नहीं है,उसकी बुद्धि नहीं हो सकती क्योंकि बुद्धि तो वहां मिलती है।एक ही दुकान है जहां से बुद्धि ला सकते हो।एक ही हाट है जहां से ज्ञान मिलता है।और वह हाट है –सदगुरु की
सदगुरु की दुकान पर सच्चा सौदा होता है।सच्चा सौदा यही है कि वहां से तुम ज्ञान बुद्धि ले आओ।जब ज्ञान बुद्धि है,तो तुम बुरा कर्म कर ही नहीं सकते।जब बुरा कर्म नहीं होगा तो तुम्हारे जीवन में दुःख नहीं आयेगा।फिर तुम्हारे जीवन में सुख ही सुख होगा।यह तो एक सीधी सी कमियां हैं।इसलिए जो बुरे का संग है,वह तुम्हें बुराई की ओर लेकर जाता है और तुम बुरे काम करोगे। उन्हीं बुरे कामों से तुम्हें बुरा फल,दुःख और कष्ट मिलता है।तो बुरे का संग जीवन से समाप्त करो।
परम पूज्य सदगुरुदेव शून्यो जी महाराजll

