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चंडीगढ़:- 18 अप्रैल: आरके विक्रमा शर्मा/ करण शर्मा+ राजेश पठानिया/ अनिल शारदा प्रस्तुति:–ढाई-तीन घंटे की फ्लाइट में भी लोगों को नाश्ता, लंच, डिनर, दारू, लिम्का, पानी, अखबार, म्यूजिक सब चाहिए। मतलब साल में कई प्रकार के निर्जला टाइप व्रत रखने वाले लोगों का फ्लाइट में बैठते ही कंठ सूखने लगता है। हालाँकि पानी तो एयर होस्टेस पिला ही देती हैं।
जबकि हवाई जहाज को हमारे देश में हौवा बना दिया है। एयरपोर्ट में घुसते ही न जाने लोगों को कौन सा कीड़ा काट लेता है कि दिल्ली से औरंगाबाद की फ्लाइट के यात्री भी एकदम ब्रिटिश एक्सेंट में बात करने लगते हैं।
जबकि टिकट बुक करने वाले से लेकर जहाज का ड्राइवर तक सब देशी ही हैं। जबकि होना यह चाहिये कि समस्त घरेलू उड़ानों को मेट्रो के मास रैपिड ट्रांजिट सिस्टम की तर्ज़ पर चलाना चाहिए। कि एक मेट्रो आएगी दो मिनट रुकेगी, लोगों को भरेगी और उनके डेस्टिनेशन पर बाहर फेंक कर फिर फुर्र हो जाएगी।
न कोई विंडो सीट, न चाय, नाश्ता, पानी और न ही कोई लू न लपट। बैठने से ज्यादा लोग खड़े होना पसंद करते हैं। और अपने इसी चरित्र की वजह से मेट्रो खासकर दिल्ली मेट्रो न केवल सफल है बल्कि मुनाफे में भी चल रही है।
और इसलिए भारत में अगर घरेलू विमानन सेवाओं का फ्यूचर ब्राइट बनाना है तो सबसे पहले उसके नाम और उसके परिचालन से जुड़ी तमाम अंग्रेज़ियत और लग्जरी को खत्म करना होगा। आपको मानना होगा कि हवाई जहाज लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक फटाफट पहुँचाने के लिए हैं न कि उन्हें किसी स्वप्न लोक या फाइव स्टार एक्सपीरियंस को फील करवाने के लिए।
रेस्क्यू ऑपेरशन में यूज होने वाले विमानों की तर्ज़ पर यात्री विमानों में भी सिटिंग से ज्यादा फर्श पर बैठने की व्यवस्था होनी चाहिए।
एयर होस्टेस की पोस्ट खत्म कर देना चाहिए। ग्लैमर की आड़ में भली और भोली लड़कियाँ इस फ़िज़ूल की फील्ड में आ जाती हैं। जहाँ कोई भविष्य और सम्मान नहीं हैं। अगर UPSC ब्यूटीफुल होने के 15 नम्बर ज्यादा देने लगे तो ये लड़कियाँ हर साल भारी तादाद में कलेक्टर और एसपी बन सकती हैं। अगर यह भी न बन सकीं तो किसी भावी कलेक्टर की प्रेरणा तो बन ही सकती हैं।
इनके स्थान पर एक कंडक्टर और एक क्लीनर रखना चाहिए। क्लीनर जहाँ लोगों को पानी पिलाता रहेगा वहीं कंडक्टर लोगों के टिकट चैक करके लोगों को बैठने की जगह अलॉट करता रहेगा।
जहाज के उतरने पर यात्रियों को सामान हवाई पट्टी पर ही देकर, आउटर पर उतार देना चाहिए, जहाँ से वे टेम्पो-टैक्सी पकड़कर अपने घर पहुँच जाएँगे। वरना बताइये कि इसके अलावा किसी भी परिवहन माध्यम का बुनियादी कार्य क्या होता है?
और भगवान के लिए कस्टमर सेटिस्फेक्शन की बात मत कीजियेगा। कस्टमर कोई परालौकिक प्रजाति नहीं होती है। आप और हमारे जैसे आदमजात ही होते हैं। जिसे बनाने वाले ब्रह्मा जी भी संतुष्ट नहीं कर सके, 18 घंटे काम करने वाले मोदी जी भी जिसको समझ नहीं पाए, वे लोग किसी जेट और किंगफिशर या यशवंत सिन्हा जी के बेटे से खुश हो जाएँगे, भूल ही जाइये।
हाँ, इस सारे प्रोसेस में सरकार को सुरक्षा, जांच जैसी व्यवस्थाओं को जरूर चुस्त-दुरुस्त और वर्ल्ड क्लास रखना चाहिए। CISF की जगह रैपिड एक्शन फोर्स और ट्रैफिक पुलिस के जवान हवाई अड्डे और जहाज में तैनात करके उनको पहली हिदायत यह देना चाहिए कि जो भी लोकल उड़ानों में अँग्रेज़ी बोले उसमें दो लट्ठ तुरंत घाल दो। यह लोग यात्रा करने आए हैं या किसी कॉल सेंटर में इंटरव्यू देने। ऐसे ही लोग होते हैं जो अपने ही देश में अपनी भाषा बोलने वालों को हिकारत से देखते हैं, उनमें हीन भावना भरते हैं।
देश के एक जिम्मेदार नागरिक और दुर्लभ हवाई यात्री होने के नाते मेरा यह फ़र्ज़ था कि मैं अपने विचारों से सरकार और विमानन मंत्रालय को अवगत कराऊँ। तथापि किसी को टैग नहीं कर रहा हूँ। भारत सरकार को दरकार होगी तो उनके बाबू खुद से आकर यह पोस्ट पढ़ेंगे और मोदी जी को अवगत कराएँगे। और ईश्वर साक्षी है इस बात का कि हमें क्रेडिट की दरकार कभी नहीं रही।~ प्रोफ़ेसर साहब, सदी के सर्वश्रेष्ठ विचारक(वाया कमलकांत शर्मा साहब) साभार व्हाट्सएप यूजर।।।

