पृथ्वी पर अमृत की वर्षा,प्रदोष एवं निशीथ (अर्द्धरात्रि)-उभयव्यापिनी आश्विन पूर्णिमा की रात्रि को शरद् पूर्णिमा का व्रत

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व्रत को लेकर संशय पर लेख:::

चंडीगढ़:- 19 अक्टूबर:-अल्फा न्यूज़ इंडिया डेस्क प्रस्तुति:–शरद पूर्णिमा, मतलब पृथ्वी पर अमृत की वर्षा,प्रदोष एवं निशीथ (अर्द्धरात्रि)-उभयव्यापिनी आश्विन पूर्णिमा की रात्रि को शरद् पूर्णिमा का व्रत 19 अक्तूबर को ही मान्य:पंडित कृष्ण मेहता यह महत्वपूर्ण धर्म संगत जानकारी अल्फा न्यूज़ इंडिया के माध्यम से अपने लाखों सुधी पाठकों तक प्रेषित कर रहे हैं।

इस साल ये पूर्णिमा 19 अक्टूबर 2021 दिन मंगलवार को है। हालांकि पंचांग भेद होने के कारण कुछ जगहों पर यह पर्व 20 अक्टूबर को भी मनाया जाएगा। प्रदोष एवं निशीथ-व्यापिनी (उभयव्यापिनी) आश्विन पूर्णिमा में शरद्-पूर्णिमा कोजागर व्रत किया जाता है।
पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की प्रदोष एवं निशीथ (अर्द्धरात्रि)-उभयव्यापिनी आश्विन पूर्णिमा की रात्रि को शरद् पूर्णिमा का व्रत19 अक्तूबर, 2021 को ही मान्यवर्ष 2021 मे यह तिथि 19 अक्तूबर, 2021 को प्रदोष एवं निशीथ-उभयव्यापिनी है। 20 अक्तूबर, 2021 को तो यह केवल प्रदोषकाल को स्पर्श कर रही है। जबकि 19 अक्तूबर, 2021 को सायं 17:48 पीएम से 8:22 पीएम तक आश्विन पूर्णिमा प्रदोष काल, तदुपरान्त निशीथकाल को व्याप्त होगी।
इस व्रत को आश्विन पूर्णिमा, कोजगारी पूर्णिमा और कौमुदी व्रत के नाम से भी जानते हैं।
पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- 19 अक्टूबर 2021 को शाम 07 बजे से
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 20 अक्टूबर 2021 को रात 08 बजकर 20 मिनट पर
पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की शरद पूर्णिमा पर मंदिरों में विशेष पूजा का आयोजन होता है। शरद पूर्णिमा का दिन मां लक्ष्‍मी को प्रसन्‍न करने के लिए खास माना जाता है। कहते हैं इस रात मां लक्ष्मी भ्रमण पर निकलती हैं।इस रात चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है, इसलिए चांद की रोशनी पृथ्वी को अपने आगोश में ले लेती है।

वर्ष के बारह महीनों में ये पूर्णिमा ऐसी है, जो तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। इस पूर्णिमा को चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है, तो धन की देवी महालक्ष्मी रात को ये देखने के लिए निकलती हैं कि कौन जाग रहा है और वह अपने कर्मनिष्ठ भक्तों को धन-धान्य से भरपूर करती हैं।

पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की शरद पूर्णिमा का एक नाम कोजागरी पूर्णिमा भी है यानी लक्ष्मी जी पूछती हैं- कौन जाग रहा है? अश्विनी महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है इसलिए इस महीने का नाम अश्विनी पड़ा है।

एक महीने में चंद्रमा जिन 27 नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उनमें ये सबसे पहला है और आश्विन नक्षत्र की पूर्णिमा आरोग्य देती है।

केवल शरद पूर्णिमा को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से संपूर्ण होता है और पृथ्वी के सबसे ज्यादा निकट भी। चंद्रमा की किरणों से इस पूर्णिमा को अमृत बरसता है।

पंडित कृष्ण मेहता ने अल्फा न्यूज़ इंडिया को बताया कि आयुर्वेदाचार्य वर्ष भर इस पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं। जीवनदायिनी रोगनाशक जड़ी-बूटियों को वह शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं। अमृत से नहाई इन जड़ी-बूटियों से जब दवा बनायी जाती है तो वह रोगी के ऊपर तुंरत असर करती है। चंद्रमा को वेदं-पुराणों में मन के समान माना गया है- चंद्रमा मनसो जात:। वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक बताया गया है। प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को औषधीश यानी औषधियों का स्वामी कहा गया है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार- सोम या चंद्रमा से जो सुधामय तेज पृथ्वी पर गिरता है उसी से औषधियों की उत्पत्ति हुई और जब औषधी 16 कला संपूर्ण हो तो अनुमान लगाइए उस दिन औषधियों को कितना बल मिलेगा।

पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से शरीर के सभी रोग दूर होते हैं। ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन और भाद्रपद मास में शरीर में पित्त का जो संचय हो जाता है, शरद पूर्णिमा की शीतल धवल चांदनी में रखी खीर खाने से पित्त बाहर निकलता है।

पंडित कृष्ण मेहता ने बताया लेकिन इस खीर को एक विशेष विधि से बनाया जाता है। पूरी रात चांद की चांदनी में रखने के बाद सुबह खाली पेट यह खीर खाने से सभी रोग दूर होते हैं, शरीर निरोगी होता है।  शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। स्वयं सोलह कला संपूर्ण भगवान श्रीकृष्ण से भी जुड़ी है यह पूर्णिमा। इस रात को अपनी राधा रानी और अन्य सखियों के साथ श्रीकृष्ण महारास रचाते हैं। पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की कहते हैं जब वृन्दावन में भगवान कृष्ण महारास रचा रहे थे तो चंद्रमा आसमान से सब देख रहा था और वह इतना भाव-विभोर हुआ कि उसने अपनी शीतलता के साथ पृथ्वी पर अमृत की वर्षा आरंभ कर दी।

गुजरात में शरद पूर्णिमा को लोग रास रचाते हैं और गरबा खेलते हैं। मणिपुर में भी श्रीकृष्ण भक्त रास रचाते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में शरद पूर्णिमा की रात को महालक्ष्मी की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा को जो महालक्ष्मी का पूजन करते हैं और रात भर जागते हैं, उनकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।

ओडिशा में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। आदिदेव महादेव और देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। गौर वर्ण, आकर्षक, सुंदर कार्तिकेय की पूजा कुंवारी लड़कियां उनके जैसा पति पाने के लिए करती हैं।

शरद पूर्णिमा ऐसे महीने में आती है, जब वर्षा ऋतु अंतिम समय पर होती है। शरद ऋतु अपने बाल्यकाल में होती है और हेमंत ऋतु आरंभ हो चुकी होती है और इसी पूर्णिमा से कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता है।

अश्विन मास की पूर्णिमा को शरद् पूर्णिमा, कोजागार

पूर्णिमा व्रत, कौमुदी व्रत और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है । इस दिन पूरा चंद्रमा दिखाई देने के कारण इसे महापूर्णिमा भी कहते हैं।

ज्योतिष शास्त्र मे मान्यता है कि सम्पूर्ण वर्ष कि पूर्णिमाओ मे केवल शरद पूर्णिमा को ही, चन्द्रमा सोलह कला सम्पूर्ण होता है, तथा इस दिन चन्द्रमा अपनी दिव्य रश्मियो द्धारा अमृृत वर्षा करते है ।

इस दिन चन्द्रदेव व भगवान विष्णु का पूजन, व्रत, कथा की जाती है. धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन चन्द्र अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होते हैं. इस दिन श्रीसूक्त, लक्ष्मीस्तोत्र का पाठ करके हवन करना चाहिए. इस विधि से कोजागर व्रत करने से माता लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं तथा धन-धान्य, मान-प्रतिष्ठा आदि सभी सुख प्रदान करती हैं ।

भगवान श्रीकृष्णजी ने महारास लीला के लिए इसी रात्रि को चुना था। साथ ही माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी रात के समय भ्रमण में निकलती है, इसीलिए इस दिन सभी लोग जगते है । जिससे कि मां की कृपा उन पर बरसे और उनके घर से कभी भी लक्ष्मी न जाएं।

पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की इस रात चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है और मां लक्ष्मी पृथ्वी पर आती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह रात्रि स्वास्थ्य व सकारात्मकता प्रदान करने वाली मानी जाती है।

मन इन्द्रियों का निग्रह कर अपनी शुद्ध अवस्था में आ जाता है। मन निर्मल एवं शांत हो जाता है, तब आत्मा रूपी सूर्य का प्रकाश मनरूपी चन्द्रमा पर प्रकाशित होने लगता है।

हिन्दू धर्मशास्त्र में वर्णित कथाओं के अनुसार देवी-देवताओं के अत्यंत प्रिय दुर्लभ पुष्प ब्रह्मकमल भी इसी दिन खिलता है।

दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें।

पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है ।

चन्द्रमा की चाँदी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है। शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है ।

शरद् पूर्णिमा पूजन विधि:-

पंडित कृष्ण मेहता के मुताबिक शरद् पूर्णिमा के दिन क्रमशः पूजा की दो विधियाँ अधिक प्रचलित है । इनमे एक विधि के अनुसार सत्यनारायण की पूजा तथा दूसरे नियम के अनुसार माता लक्ष्मी जी की पूजा का विधान है ।

1. सत्यनारायण पूजा विधि:-

पंडित कृष्ण मेहता के मुताबिक यदि मासिक सत्यनारायण जी की पूजा-व्रत करते है तो प्रातःकाल अराध्यदेव को सुंदर वस्त्राभूषणो से सुशोभित करके, वेदी पर स्थापित कर गंध, पुष्प, अक्षत, पान-सुपारी, धूप-दीप, नैवेघ से पूजा करके व्रत कथा सुने, कथा सुनते समय एक लोटे मे जल, तथा एक कलश मे गेहूं भरकर रखे । गेहूं के 13 दाने हाथ मे रखे, कथा सुनने के बाद कलश पर से हाथ घुमाकर ( सकंल्प ) ब्राह्मणी के चरण स्पर्श कर उसेे दे दे तथा साथ मे अन्य वस्तुओं के दान, दक्षिणा सहित देकर उन्हें तृप्त कर उनसे आर्शीवाद ग्रहण करे । लोटे के जल से चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्ध्य दे दे ।

यदि व्रत नही करते तो भी, और व्रत रखते हो तो भी, संध्या समय भगवान विष्णु, भगवान राम या भगवान श्री कृृष्ण जी के सुन्दर चित्र को फूलो तथा वस्त्राभूषणो से सुशोभित कर उनकी पूजा अर्चना करे, भगवान का मंत्रजाप अथवा पाठ भी कर सकते है ।

2. लक्ष्मी माता पूजा विधि:-

पंडित कृष्ण मेहता के मुताबिक शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है पूरी रात जागना। ऐसा कहा जाता है कि जो व्यक्ति (भक्त) शरद पूर्णिमा की पूरी रात जागते रहते हैं, और देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन्हें देवी का असीम आशीर्वाद और धन प्राप्त होता है, भले ही उनकी जन्म कुंडली में कोई धन योग हो या न हो।

ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा अथवा चित्र को स्थापित करके पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार से उनकी पूजा करें।

तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए सौ दीपक जलाए।

इसके उपरांत घी तथा नाना प्रकार के मेवा-मिश्री द्वारा निर्मित खीर को बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (3 घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें।

पंडित कृष्ण मेहता के मुताबिक तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। यदि रात्रि काल मे ब्राह्मण उपलब्ध न हो तो अगले दिन प्रातः का अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें।

पंडित कृष्ण मेहता के मुताबिक ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं, और देखती है, कि इस समय भूतल पर जागकर जो भी मनुष्य माता की पूजा में रत होता है, उस मनुष्य को माता तमाम प्रकार के धन-धान्यों तथा वैभव प्रदान करती है ।

शरद् पूर्णिमा तथा दिव्य खीर :-

भगवान की पूजा अथवा जाप-पाठ इत्यादि करते समय

गौ के दूध मे बादाम-किशमिश-केसर तथा अन्य मेवो से युक्त खीर बनाकर, भगवान को भोग लगाये और चंद्रोदय के बाद इस खीर से भी चंद्रमा को अर्ध्य दे ।

रात्रिकाल मे इस खीर को भगवान के सम्मुख किसी ऐसे सुरक्षित स्थान पर रखे, जहां रात भर चन्द्रमा की दिव्य चांदनी इस पर पडती रहे । खीर के इस पात्र को किसी जालीदार वस्त्र से ढ़ककर कीट- पतंगो आदि से बचाकर रखे परंतु चंद्र किरणे इस खीर मे जाना आवश्यक है।

अगले दिन खीर का पुनः भगवान को भोग लगाकर ब्राह्मण को खीर देने के उपरांत पूरे परिवार, रिश्तेदार, पडोसी तथा अन्य लोगो को भी खीर बांटे तथा स्वंय भी ग्रहण करे

इस प्रकार से शरद् पूर्णिमा की रात को चंद्रमा की खुली चांदनी मे रखी खीर अमृृत समान गुणकारी हो जाती है, इसमे दिव्य औषधिय गुण समाहित हो जाते है । इस खीर को ग्रहण करने से अनेक शारीरिक तथा मानसिक रोगो मे राहत प्राप्त होती है, जैसे दमा-अस्थमा तथा सांस संबधी व्याधि, डिप्रेशन, मिर्गी इत्यादि मानसिक विकार, स्त्रियो के मासिक धर्म संबधी विकार, कफ, नजला-जुकाम, टी.बी, तपेदिक, मूत्ररोग, इत्यादि अनेक भयंकर रोग इस खीर के दिव्य प्रभाव से नष्ट हो जाते है ।

*शरद्पूर्णिमा के दिन किए जाने वाले अन्य उपाय इस प्रकार से है:-*

1. काफी लोगो को शिकायत होती है कि वह चाहे कितना भी किसी का भला कर ले उन्हे बदले मे नाम या भलाई नही मिलती, तो ऐसे लोगो अथवा अन्य गणमान्य लोग, यश-कीर्ति, मान-सम्मान, प्राप्त करने हेतू, इस दिन गाय के धी का किसी विद्वान पुरुष को भेंट करे ।

2. यदि यही दान अर गाय का धी किसी कांसे के बरतन मे डालकर किया जाये तो यह उपाय शुक्र ग्रह की प्रसन्नता अथवा शांति से विवाहित जीवन के सुखो, ऐश्वर्य तथा पौरुष शक्ति को प्रदान करेगा ।( शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्ति यदि इस उपाय को करे तो उन्हे लाभ प्राप्त होता है ।

3. इस दिन दोपहर को हाथी को चारा देने से चंद्र तथा बुध ग्रह की प्रसन्नता प्राप्त होती है ।

4. इस दिन घर मे स्नान करने की बजाय नदी, तीथ्रस्थान, सरोवर या कुंआ इत्यादि मे स्नान करके चंद्रमा के दिव्य प्रभाव को प्राप्त करे ।

नोटः- पंडित कृष्ण मेहता ने बताया की विवाह के बाद पूर्णिमा के व्रत की शुरुआत इसी शरद पूर्णिमा से ही करे।
कार्तिक मास जो कि अत्यन्त पावन तथा अनेक पर्व-त्यौहारो का मास है, इस मास के लगातार तीस दिन चलने वाले स्नान-दान-व्रत का आरंभ भी इसी शरद् पूणिमा के व्रत तथा पवित्र तीथ्र स्नान से ही शुरु होता है ।

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