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परायेपन की इस हद तक रवायत देख ली मैंने
बची है पास अब किसके मुरव्वत देख ली मैंने
निकल के आ गया हूँ मैं तेरी बेमानी चाहत से
मुहब्बत करने वाले की मुहब्बत देख ली मैंने
सभी इल्ज़ाम हैं मुझपर सभी इल्ज़ाम हैं जायज़
शिकायत में छुपी उसकी इनायत देख ली मैंने
ये सारी उम्र गुज़री है शराफत को परखने में
शरीफों ने निभाई जो शराफत देख ली मैंने
बजाए बोलने के कुछ,कहा ख़ामोश रहने को
ये अपने मुल्क़ की बेहतर हुकूमत देख ली मैंने
हमेशा ध्यान में रहती है सूरत एक मुंसिफ की
बड़े नज़दीक से जाकर अदालत देख ली मैंने
🎉🎉नवीन नीर की दूसरी कविता—-🔥
नशे में चूर सत्ता के सियासत हो भी सकती है
कि साधू को हुकूमत की अब आदत हो भी सकती है
सभी की आंख पर पट्टी सभी के कान में रूई
धरम के नाम पर अंधी इबादत हो भी सकती है
ख़ुदा होने का मतलब ये नहीं राज़ी हैं सब तुमसे
तेरे बंदों को कुछ तुझसे शिकायत हो भी सकती है
न आंसू खून के ऐसे रूलाओ मुफलिसों को अब
कि इन मज़लूमों की आहों में ताकत हो भी सकती है
तेरे किरदार के पीछे कई किरदार हैं बाकी
शराफत के मुखौटे में शरारत हो भी सकती है।।
नवीन नीर


